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छठ: सामाजिक सरोकारों से कहीं ऊपर, ये मेरे अस्तित्व के लिए ज़रूरी है

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आज का ज़माना सांस्कृतिक तरलता का ज़माना है। या यूं कहें, लैंगिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तरलता का ज़माना। सब तो नहीं, पर कम-से-कम आज कई खुले दिमाग वाले लोग हैं, जैसे की शायद आप, जो ये आलेख पढ़ रहे हैं, जो अलग को स्वीकार करते हैं न कि उसे किसी भी प्रकार से कष्टप्रद मानते हैं। ऐसी सोच उस देश के लिए आवश्यक हो जाती है, जो सांस्कृतिक रूप से उतना ही समृद्ध है जितना कि वो पितृसत्ता का पुजारी रहा है, और जिसका कुछ सात से आठ दशकों पहले का इतिहास विदेशी नियंत्रण और आक्रांताओं से भी जुड़ा है। ऐसी सोच उस देश के लिए जरूरी है जहां एक धर्मविशेष अधिकाधिक रूप से विद्यमान है, पर बाकी के धर्मों का सम्मान न करने का सवाल ही नहीं बनता, बल्कि उन अल्पसंख्यक धर्मों की प्रकृति को सहेजने का निरंतर प्रयास होता है (धर्म एक ऐसा कॉन्सेप्ट है जो मेरे लिए मायने नहीं रखता, सच पूछें तो)। ऐसी तरलता उस देश में जरूरी हैं जहां के युवा शायद दुनिया में सबसे ज्यादा हैं।  इसीलिए मैं यहां एक तरह से भाषाई तरलता का प्रयोग कर रहा हूं। पहले मन में आया की ये आलेख भोजपुरी में लिखा जाए। पर भोजपुरी का आप उतनी आसानी से अनुवा...